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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

श्रीरामजी ने सतीजी को सीता रूप में पहचान लिया तो क्या

सर्वज्ञ भगवान ने सतीजी का कपट तुरन्त जान लिया। हाथ जोड़कर प्रणाम किया, पितासहित अपना नाम बताया और पूछा — 'वृषकेतु (शिवजी) कहाँ हैं?

संक्षिप्त उत्तर

सर्वज्ञ भगवान ने सतीजी का कपट तुरन्त जान लिया। हाथ जोड़कर प्रणाम किया, पितासहित अपना नाम बताया और पूछा — 'वृषकेतु (शिवजी) कहाँ हैं? आप वन में अकेली क्यों फिर रही हैं?' — यह सुनकर सतीजी को अत्यन्त लज्जा और संकोच हुआ।

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विस्तृत उत्तर

सर्वज्ञ भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने सतीजी के कपट को तुरन्त जान लिया। उन्होंने पहले हाथ जोड़कर सतीजी को प्रणाम किया और पितासहित अपना नाम बताया। फिर पूछा कि शिवजी (वृषकेतु) कहाँ हैं और आप यहाँ वन में अकेली क्यों भटक रही हैं?

चौपाई — 'सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी। सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥'

इसका अर्थ — सब कुछ देखनेवाले और सबके हृदयकी जाननेवाले देवताओंके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सतीके कपटको जान गये; जिनके स्मरणमात्रसे अज्ञानका नाश हो जाता है, वही सर्वज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं।

आगे — 'जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू। कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥'

अर्थ — पहले प्रभुने हाथ जोड़कर सतीको प्रणाम किया और पितासहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु (शिवजी) कहाँ हैं? आप यहाँ वनमें अकेली किसलिये फिर रही हैं?

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

श्रीरामजी ने सतीजी को सीता रूप में पहचान लिया तो क्या कहा को संदर्भ सहित समझें

श्रीरामजी ने सतीजी को सीता रूप में पहचान लिया तो क्या कहा का सबसे सीधा सार यह है: सर्वज्ञ भगवान ने सतीजी का कपट तुरन्त जान लिया। हाथ जोड़कर प्रणाम किया, पितासहित अपना नाम बताया और पूछा — 'वृषकेतु (शिवजी) कहाँ हैं? आप वन में अकेली...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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