विस्तृत उत्तर
यह श्रीरामजी की बाललीला का वर्णन है जब वे छोटे बालक रूप में ठुमक-ठुमककर चलते थे और उनके पैरों की पैंजनियाँ (पायल) बजती थीं।
बालकाण्ड में इसी भाव से कहा — 'कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई। निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरैं जननी हठि धावा॥'
अर्थ — कौसल्याजी जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमक-ठुमककर भाग चलते हैं। जिनका वेद 'नेति-नेति' (इतना ही नहीं) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजीने जिनका अन्त नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़ने के लिये दौड़ती हैं।
यह बाललीला का अत्यन्त मधुर प्रसंग है — सर्वव्यापक, अनन्त ब्रह्म अपनी माता की गोद से ठुमककर भागते हैं और माता उन्हें पकड़ने दौड़ती हैं।

