विस्तृत उत्तर
नारदजी राजकुमारी पर मोहित होकर उसे पाने की इच्छा से भगवान विष्णु के पास गये और उनसे अपना सुन्दर 'हरि' रूप माँगा ताकि राजकुमारी उन्हें वरे।
चौपाई — 'करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी। जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥'
अर्थ — मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप-तपसे तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी?
फिर नारदजी भगवान के पास गये और प्रार्थना की कि मुझे अपना 'हरि' रूप दे दीजिये। भगवान ने मुनिके हितके लिये उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया जिसका वर्णन नहीं हो सकता — वानर (बन्दर) का मुख दे दिया। पर माया के वशीभूत नारदजी को पता ही नहीं चला।
स्वयंवर में नारदजी अपने रूपका बड़ा अभिमान लेकर बैठे। पर राजकुमारी ने उन्हें छोड़कर भगवान विष्णु (जो स्वयं वहाँ आये थे) को जयमाला पहना दी।





