विस्तृत उत्तर
बालकाण्ड में विश्वामित्रजी ने श्रीरामजी को अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्रदान की — जिन्हें 'विद्यानिधि' कहा गया है।
चौपाई — 'तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥'
अर्थ — तब ऋषिने अपने नाथ (भगवान) को हृदयमें पहचान लिया (जान लिया कि ये साक्षात भगवान हैं) और विद्यानिधि (विद्याओं के भण्डार भगवान) को (अनेक) विद्याएँ दीं।
आगे — 'जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा' — जिनसे भूख-प्यास नहीं लगती और शरीरमें अतुलित बल और तेज प्रकाशित होता है।
मानस में अस्त्रों के विशिष्ट नाम नहीं गिनाये गये। वाल्मीकि रामायण में बला-अतिबला विद्या और अनेक दिव्यास्त्रों का विस्तृत वर्णन है।





