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बालकाण्ड प्रश्नोत्तरी — 321 प्रश्न

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित बालकाण्ड विषय के प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 321 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

'राम चरित जे सुनहिं सुनावहिं' — ऐसे लोगों को क्या फल मिलता है?

जो रामचरित स्नेहसहित कहते-सुनते हैं वे राम चरणों में अनुरागी होंगे, कलियुग के सब पापों से मुक्त और शुभ भाग्यवाले होंगे। रामचरितमानस सुनने से शान्ति मिलती है और विषयरूपी दावानल में जलता मन सुखी हो जाता है।

बालकाण्डरामचरितश्रवण फल
रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

बालकाण्डमानस अर्थनामकरण
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — इसका क्या अर्थ है?

अर्थ — निर्गुण (निराकार) और सगुण (साकार) दोनों ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। दोनों अकथनीय, अगाध, अनादि और अनुपम हैं। तुलसीदासजी ने दोनों को एक ही ब्रह्म के दो पहलू बताकर निर्गुण-सगुण विवाद का समाधान किया।

बालकाण्डनिर्गुण सगुणब्रह्म
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने 'निर्गुण' और 'सगुण' राम में किसे श्रेष्ठ बताया?

तुलसीदासजी ने कहा — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — दोनों ब्रह्म के स्वरूप हैं, किसी को बड़ा-छोटा कहना अपराध है। किन्तु सगुण भक्ति (राम की लीला) कलियुग में सुगम मार्ग बताया गया।

बालकाण्डनिर्गुणसगुण
रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में राम नाम की महिमा कितने दोहों/छन्दों में वर्णित है?

बालकाण्ड में नाम महिमा का वर्णन दोहा 19 से 27-28 तक लगभग 8-10 दोहों और दर्जनों चौपाइयों में फैला हुआ है। इसमें नाम के दो अक्षर, शिवजी का जप, वाल्मीकि का उद्धार, कलियुग में नाम का एकमात्र आधार होना आदि अनेक पक्ष बताये गये।

बालकाण्डनाम महिमाविस्तार
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'राम भगति मनि उर बस जाके' — राम भक्ति की तुलना किससे की गई?

राम भक्ति की तुलना मणि (रत्न) से की गई है। अर्थ — जिसके हृदय में रामभक्तिरूपी मणि बसी है, उसको स्वप्न में भी रत्तीभर दुख नहीं होता।

बालकाण्डराम भक्तिमणि उपमा
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने राम नाम को शिवजी का प्राणप्रिय क्यों कहा?

शिवजी स्वयं इस महामंत्र का जप करते हैं, काशी में मरने वालों को मुक्ति के लिये यही नाम उपदेश करते हैं, और एक राम नाम को हज़ार नामों के समान मानते हैं। नाम के प्रभाव से ही गणेशजी सबसे पहले पूजे जाते हैं।

बालकाण्डशिवराम नाम
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन' — ऐसे भक्तों की क्या विशेषता बताई?

ऐसे निष्काम भक्तों ने रामनाम के प्रेमरूपी अमृत-सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है — जैसे मछली जल से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही वे क्षणभर भी नाम-प्रेम से अलग नहीं होते। वे भोग और मोक्ष दोनों की कामना से रहित हैं।

बालकाण्डनिष्काम भक्तिनाम प्रेम
रामचरितमानस — बालकाण्ड

कलियुग में मुक्ति का एकमात्र उपाय क्या बताया गया है रामचरितमानस में?

कलियुग में राम नाम ही एकमात्र आधार है। तुलसीदासजी ने कहा — 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।' कलियुग में न कर्म है, न भक्ति, न ज्ञान — केवल राम नाम ही उपाय है।

बालकाण्डकलियुगराम नाम
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी' — चार प्रकार के भक्त कौन हैं?

चार प्रकार के भक्त हैं — (1) अर्थार्थी (धन चाहने वाले), (2) आर्त (संकट निवृत्ति चाहने वाले), (3) जिज्ञासु (भगवान को जानने वाले), (4) ज्ञानी (तत्त्व से जानकर प्रेम से भजने वाले)। चारों को नाम का आधार है, पर ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष प्रिय हैं।

बालकाण्डचार प्रकार भक्तनाम महिमा
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने राम नाम को निर्गुण और सगुण दोनों से कैसे बड़ा बताया?

तुलसीदासजी ने कहा कि राम नाम निर्गुण और सगुण दोनों के बीच 'सुन्दर साक्षी' और 'चतुर दुभाषिया' है — दोनों का ज्ञान कराने वाला। रूप नाम के अधीन है, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता।

बालकाण्डनाम महिमानिर्गुण सगुण
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार' — इसमें राम नाम की तुलना किससे है?

राम नाम की तुलना मणि-दीपक से की गई है। अर्थ — यदि भीतर-बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहली पर रामनामरूपी मणि-दीपक रख दो।

बालकाण्डराम नाममणि दीपक
रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'राम' नाम को किन दो अक्षरों का बताया गया है?

'राम' नाम दो अक्षरों — 'र' और 'म' का है। ये दो अक्षर अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा के बीजरूप हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुलसीदासजी ने इन्हें सावन-भादों के दो महीनों की उपमा दी।

बालकाण्डराम नामदो अक्षर
रामचरितमानस — बालकाण्ड

खलों (दुष्टों) के स्वभाव की तुलना बालकाण्ड में किस-किस से की गई है?

खलों की तुलना — (1) ओलों से (दूसरों को नष्ट कर स्वयं भी नष्ट), (2) कालनेमि-रावण-राहु से (कपटी वेषधारी), (3) जोंक से (कमल-जोंक एक जल में पर गुण भिन्न), (4) उल्लू से (प्रकाश/सत्संग से कष्ट), (5) हज़ार मुखवाले से (दोष बखानने में)।

बालकाण्डखल स्वभावउपमा
रामचरितमानस — बालकाण्ड

असंतों की तुलना तुलसीदासजी ने किससे की — कौन सा प्रसिद्ध दोहा है?

असंतों की तुलना ओलों से की (खेती नष्ट कर स्वयं भी गलते हैं), कालनेमि-रावण-राहु से की (वेष बनाते हैं पर कपट अन्त में खुल जाता है)। प्रसिद्ध दोहा — 'उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति' — दुष्ट किसी का भी हित सुनकर जलते हैं।

बालकाण्डअसंतखल स्वभाव
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'संत असंत के लक्षण' — बालकाण्ड में संत और असंत में क्या अंतर बताया गया है?

संत हंस के समान गुणरूपी दूध ग्रहण करते हैं, दूसरों के दोष ढकते हैं, कपास समान निरस और उज्ज्वल हैं। असंत (खल) किसी का भी हित सुनकर जलते हैं, दूसरों के दोष हज़ार आँखों से देखते हैं। दोनों एक ही संसार में उत्पन्न होते हैं पर गुण कमल-जोंक समान भिन्न हैं।

बालकाण्डसंत लक्षणअसंत लक्षण
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने संतों की तुलना किस फूल से की है?

संतों की तुलना अंजलि (हथेलियों) में रखे शुभ सुमन (सुन्दर फूलों) से की है। जैसे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबके प्रति बिना भेदभाव के समान भाव रखते हैं।

बालकाण्डसंतसुमन उपमा
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ' — संतों की क्या विशेषता बताई गई?

संतों की विशेषता बताई — उनका चित्त समान है, कोई हितैषी नहीं कोई अहितैषी नहीं। जैसे हथेलियों में रखे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबसे समान भाव रखते हैं।

बालकाण्डसंत लक्षणसमदर्शी
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी' — इसका क्या तात्पर्य है?

तात्पर्य — संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसे कहने में सकुचाती है। तुलसीदासजी ने कहा — जैसे सब्ज़ी बेचने वाला मणियों के गुण नहीं बता सकता, वैसे ही मुझसे यह महिमा कही नहीं जाती।

बालकाण्डसंत महिमाब्रह्मा-विष्णु-शिव
रामचरितमानस — बालकाण्ड

दुष्ट व्यक्ति सत्संग पाकर कैसे सुधरता है — तुलसीदासजी ने कौन सा दृष्टान्त दिया?

पारस पत्थर और लोहे का दृष्टान्त दिया — जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही सत्संग से दुष्ट भी सुधर जाता है। उल्टा नहीं होता — सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण रखता है।

बालकाण्डसत्संगपारस
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई' — इसमें सत्संग की तुलना किससे की गई है?

सत्संग की तुलना पारस पत्थर से की गई है। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं। सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण नहीं छोड़ते।

बालकाण्डसत्संगपारस
रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने सत्संग की महिमा में क्या कहा — 'बिनु सत्संग विवेक न होई' का क्या अर्थ है?

अर्थ — सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और राम की कृपा के बिना सत्संग सहज में नहीं मिलता। सत्संगति आनन्द और कल्याण की जड़ है — सत्संग की प्राप्ति ही फल है और बाकी सब साधन फूल हैं।

बालकाण्डसत्संगविवेक
रामचरितमानस — बालकाण्ड

'बालमीक नारद घटजोनी' — यहाँ घटजोनी कौन हैं?

'घटजोनी' मुनि अगस्त्यजी हैं। उनका जन्म कलश (घड़े) से हुआ था इसलिये उन्हें 'घटजोनी' या 'कुम्भज' कहते हैं। इस चौपाई में वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी तीनों का उल्लेख है।

बालकाण्डअगस्त्य मुनिघटजोनी
रामचरितमानस — बालकाण्ड

बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है?

तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि बुद्धि कंगाल है पर मनोरथ राजा है।

बालकाण्डतुलसीदासविनम्रता

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