विस्तृत उत्तर
इस दोहे में निष्काम भक्तों — अर्थात् जो सब प्रकारकी कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं — उनकी विशेषता बताई गई है।
पूरा दोहा — 'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन॥'
इसका अर्थ — जो सब प्रकारकी (भोग और मोक्षकी भी) कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं, उन्होंने भी नामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतके सरोवरमें अपने मनको मछली बना रखा है।
इसका तात्पर्य — जैसे मछली जल में ही रहती है और जल से एक क्षण भी अलग नहीं हो सकती, वैसे ही निष्काम भक्तों का मन रामनामरूपी अमृत-सरोवर में सदा डूबा रहता है, वे क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते। ऐसे भक्त सबसे श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे न धन चाहते हैं, न मोक्ष — केवल नाम-प्रेम ही उनका सर्वस्व है।





