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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन'

इस दोहे में निष्काम भक्तों — अर्थात् जो सब प्रकारकी कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं — उनकी विशेषता बताई गई है।

संक्षिप्त उत्तर

ऐसे निष्काम भक्तों ने रामनाम के प्रेमरूपी अमृत-सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है — जैसे मछली जल से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही वे क्षणभर भी नाम-प्रेम से अलग नहीं होते। वे भोग और मोक्ष दोनों की कामना से रहित हैं।

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विस्तृत उत्तर

इस दोहे में निष्काम भक्तों — अर्थात् जो सब प्रकारकी कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं — उनकी विशेषता बताई गई है।

पूरा दोहा — 'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन॥'

इसका अर्थ — जो सब प्रकारकी (भोग और मोक्षकी भी) कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं, उन्होंने भी नामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतके सरोवरमें अपने मनको मछली बना रखा है।

इसका तात्पर्य — जैसे मछली जल में ही रहती है और जल से एक क्षण भी अलग नहीं हो सकती, वैसे ही निष्काम भक्तों का मन रामनामरूपी अमृत-सरोवर में सदा डूबा रहता है, वे क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते। ऐसे भक्त सबसे श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे न धन चाहते हैं, न मोक्ष — केवल नाम-प्रेम ही उनका सर्वस्व है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन' — ऐसे भक्तों की क्या विशेषता बताई को संदर्भ सहित समझें

'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन' — ऐसे भक्तों की क्या विशेषता बताई का सबसे सीधा सार यह है: ऐसे निष्काम भक्तों ने रामनाम के प्रेमरूपी अमृत-सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है — जैसे मछली जल से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही वे...

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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