विस्तृत उत्तर
बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने रामचरित सुनने और सुनाने वालों को अनेक फल बताये हैं।
चौपाई — 'भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती। जे एहि कथहि स्नेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता। होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥'
इसका अर्थ — शिवजीकी कृपासे मेरी रचना शोभायमान होती है। जो इस कथाको स्नेहसहित कहेंगे और सुनेंगे, वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरागी (प्रेमी) होंगे, कलियुगके सब मलोंसे (पापोंसे) रहित और सुमंगल भागी (शुभ भाग्यवाले) होंगे।
साथ ही कहा — 'रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा। मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥'
अर्थ — इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानोंसे सुनते ही शान्ति मिलती है। मनरूपी हाथी विषयरूपी दावानलमें जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानसरूपी सरोवरमें आ पड़े तो सुखी हो जाय।





