विस्तृत उत्तर
तुलसीदासजी ने बालकाण्ड में निर्गुण और सगुण दोनों को ब्रह्म का स्वरूप मानते हुए दोनों में भेद करने को अपराध कहा, किन्तु सगुण भक्ति को सुगम बताया।
चौपाई — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥'
इसका अर्थ — निर्गुण और सगुण दोनों ब्रह्मके स्वरूप हैं, दोनों अकथनीय, अगाध, अनादि और अनुपम हैं।
आगे कहा — 'को बड़ छोट कहत अपराधू' — इनमें कौन बड़ा, कौन छोटा, यह कहना अपराध है।
फिर भी तुलसीदासजी ने सगुण भक्ति की सुगमता बताई — 'सुगम अगम नाना जेहि भाँती। कहहिं संत मत कोबिद नाती॥' और रामचरितमानस में सगुण राम (मर्यादा पुरुषोत्तम, अवतारी राम) की ही लीला का वर्णन किया है।
सार — निर्गुण और सगुण दोनों ब्रह्म हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं; पर नाम दोनों के बीच साक्षी और दुभाषिया है, और सगुण भक्ति कलियुग में सुगम मार्ग है।





