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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

तुलसीदासजी ने 'निर्गुण' और 'सगुण' राम में किसे श्रेष्ठ

तुलसीदासजी ने कहा — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — दोनों ब्रह्म के स्वरूप हैं, किसी को बड़ा-छोटा कहना अपराध है।

संक्षिप्त उत्तर

तुलसीदासजी ने कहा — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — दोनों ब्रह्म के स्वरूप हैं, किसी को बड़ा-छोटा कहना अपराध है। किन्तु सगुण भक्ति (राम की लीला) कलियुग में सुगम मार्ग बताया गया।

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विस्तृत उत्तर

तुलसीदासजी ने बालकाण्ड में निर्गुण और सगुण दोनों को ब्रह्म का स्वरूप मानते हुए दोनों में भेद करने को अपराध कहा, किन्तु सगुण भक्ति को सुगम बताया।

चौपाई — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥'

इसका अर्थ — निर्गुण और सगुण दोनों ब्रह्मके स्वरूप हैं, दोनों अकथनीय, अगाध, अनादि और अनुपम हैं।

आगे कहा — 'को बड़ छोट कहत अपराधू' — इनमें कौन बड़ा, कौन छोटा, यह कहना अपराध है।

फिर भी तुलसीदासजी ने सगुण भक्ति की सुगमता बताई — 'सुगम अगम नाना जेहि भाँती। कहहिं संत मत कोबिद नाती॥' और रामचरितमानस में सगुण राम (मर्यादा पुरुषोत्तम, अवतारी राम) की ही लीला का वर्णन किया है।

सार — निर्गुण और सगुण दोनों ब्रह्म हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं; पर नाम दोनों के बीच साक्षी और दुभाषिया है, और सगुण भक्ति कलियुग में सुगम मार्ग है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

तुलसीदासजी ने 'निर्गुण' और 'सगुण' राम में किसे श्रेष्ठ बताया को संदर्भ सहित समझें

तुलसीदासजी ने 'निर्गुण' और 'सगुण' राम में किसे श्रेष्ठ बताया का सबसे सीधा सार यह है: तुलसीदासजी ने कहा — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — दोनों ब्रह्म के स्वरूप हैं, किसी को बड़ा-छोटा कहना अपराध है। किन्तु सगुण भक्ति (राम की लीला) कलियुग...

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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