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तिथि

द्वितीया तिथि — तिथि — विधि, व्रत, पूजन प्रश्नोत्तर(32)

द्वितीया तिथि से जुड़े 32 प्रश्न — विधि, नियम, मंत्र, लाभ। शास्त्र-सम्मत व्याख्या एक स्थान पर।

पद्म पुराण

द्वितीया तिथि का यमराज से क्या सम्बन्ध है?

द्वितीया तिथि का यमराज से विशेष और शाश्वत सम्बन्ध है। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं। पद्म पुराण के अनुसार यमुना ने यमराज को द्वितीया तिथि पर भोजन कराया था, जिससे यमराज ने इस तिथि को महोत्सर्ग घोषित किया। तब से द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है, और इस दिन श्राद्ध करने से पितरों को विशेष राहत मिलती है।

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पद्म पुराण

यम-द्वितीया क्या है?

यम-द्वितीया कार्तिक शुक्ल द्वितीया का एक विशेष नाम है। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में देवी यमुना ने इसी तिथि पर अपने भाई यमराज को घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था। प्रसन्न यमराज ने द्वितीया को महोत्सर्ग घोषित किया, और नरक के जीवों को भी तृप्ति दी। इसे भाई-दूज या भ्रातृ-द्वितीया भी कहते हैं।

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पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का क्या सम्बन्ध है?

द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का सम्बन्ध प्रत्यक्ष है। सायुज्य का अर्थ है भगवान के साथ एक होना। स्कन्द पुराण के अनुसार द्वितीया श्राद्ध भक्ति से करने पर श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास प्राप्त करता है और शिव के गणों के साथ मोद पाता है। यह शिव-सायुज्य के निकट की अवस्था है। पितृ-भक्ति शिव-प्राप्ति का मार्ग है।

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पुराण माहात्म्य

क्या भगवान शम्भु द्वितीया न करने पर कुपित होते हैं?

हाँ, भगवान शम्भु यानी शिव द्वितीया श्राद्ध न करने पर कुपित होते हैं। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में स्पष्ट है कि जो मनुष्य द्वितीया पर अधिकार होने पर भी महालय श्राद्ध नहीं करता, कुपित शम्भु उसके ब्रह्म-वर्चस्व का सर्वथा नाश कर देते हैं और मृत्यु के बाद रौरव-कालसूत्र नरक प्रदान करते हैं। शम्भु यानी सुख देने वाले, कुपित होकर दुःख भी देते हैं।

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पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध न करने से क्या होता है?

द्वितीया श्राद्ध न करने पर तीन दुष्परिणाम होते हैं। पहला, भगवान शम्भु यानी शिव कुपित होते हैं। दूसरा, उस व्यक्ति के ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश हो जाता है। तीसरा, मृत्यु के बाद रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 230 में यह स्पष्ट वर्णन है।

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पुराण माहात्म्य

क्या द्वितीया श्राद्ध से शिव गणों का साथ मिलता है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध से शिव गणों का साथ मिलता है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और शिवेन सह मोदते यानी शिव के गणों के साथ परम मोद यानी आनन्द पाता है। शिव के दिव्य गणों का साहचर्य परम भक्त के लिए सर्वोच्च पारलौकिक प्राप्ति है। यह द्वितीया श्राद्ध की विशिष्ट महिमा है।

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पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध से शिव क्यों प्रसन्न होते हैं?

द्वितीया श्राद्ध से शिव इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि शिव महाकाल हैं यानी मृत्यु और समय के परम देवता। यमराज शिव के अधीन हैं, और द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। जब कर्ता भक्ति से पितरों का श्राद्ध करता है, तो यमराज प्रसन्न होते हैं और शिव भी प्रसन्न होते हैं। भक्तिपूर्वक पितृ-सेवा शिव की सेवा के समान है।

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पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध से कौन सा लोक मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से कैलास धाम की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय की द्वितीया को भक्ति से श्राद्ध करता है, वह मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ आनन्द पाता है। इस लोक में भी भगवान महेश्वर विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं। यह द्वितीया श्राद्ध का सर्वोच्च पारलौकिक फल है।

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पुराण माहात्म्य

स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में द्वितीया की क्या महिमा है?

स्कन्द पुराण के नागर खण्ड अध्याय 230 में महर्षि व्यास ने महालय की द्वितीया श्राद्ध की महिमा गाई है। जो मनुष्य द्वितीया को पूर्ण भक्ति से श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और शिव गणों के साथ आनन्द पाता है। इस लोक में भी विपुल सम्पदा मिलती है।

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श्राद्ध फल

क्या द्वितीया श्राद्ध से वाहन भी मिलता है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध से अश्व जैसे वाहन भी मिल सकते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया का पशू वै फल गौ, अश्व आदि की प्राप्ति है। श्लोक में एकशफं यानी एक खुर वाला पशु यानी घोड़ा भी समाहित है। आधुनिक संदर्भ में पशू वै सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि - वाहन, घर, सम्पत्ति - का प्रतीक है। परंतु वाहन का मुख्य काम्य फल तृतीया श्राद्ध से जुड़ा है, जिसमें अश्व आदि वाहनों की विशेष प्राप्ति होती है।

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श्राद्ध फल

द्वितीया से पशु-धन कैसे मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन पितरों के आशीर्वाद से प्राप्त होता है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशू वै यानी निश्चित रूप से उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है। आधुनिक संदर्भ में यह वाहन, घर, सम्पत्ति, उद्योग आदि सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि का प्रतीक है। काम्य भावना और पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करने पर पितर तृप्त होकर यह आशीर्वाद देते हैं।

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श्राद्ध फल

क्या द्वितीया श्राद्ध से कन्या के विवाह की बाधा दूर होती है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध से कन्या के विवाह की बाधा दूर होती है। याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इसे सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है। पितर तृप्त होकर योग्य वर का संकेत देते हैं, विवाह में देरी दूर होती है, परिवारों के बीच सद्भाव बनता है, और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

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श्राद्ध फल

द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद कैसे मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद पितरों के विशेष आशीर्वाद से मिलता है। कर्ता को काम्य भावना से संकल्प करके पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करना चाहिए - कुतप मुहूर्त में, नैऋत्य दिशा में मुख करके, अपसव्य अवस्था में। कुश, तिल, सत्तू, घृत, मधु से पिण्डदान, पञ्चबलि और ब्राह्मण भोजन सब करें। तृप्त पितर कन्या के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर का संकेत देते हैं।

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श्राद्ध फल

द्वितीया श्राद्ध से कौन सा विशेष फल मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से दो विशेष काम्य फल मिलते हैं - कन्यावेदिन यानी अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ दामाद की प्राप्ति, और पशू वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में यह स्पष्ट है। यह तिथि सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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तिथि शास्त्र

द्वितीया तिथि का अधिष्ठाता देवता कौन है?

द्वितीया तिथि का मुख्य अधिष्ठाता देवता यमराज हैं, जिनका इस तिथि पर विशेष आधिपत्य रहता है। पद्म पुराण के अनुसार यमुना ने यमराज को इसी तिथि पर भोजन कराया था। श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं, जो क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं। साथ ही विश्वेदेव पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष भी आहूत होते हैं।

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श्राद्ध विधि

द्वितीया श्राद्ध में किसका आवाहन होता है?

द्वितीया श्राद्ध में पार्वण विधि से तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। पितृ पक्ष से पिता, पितामह, प्रपितामह और मातृ पक्ष से मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह — सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य है। श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य भी उपस्थित होते हैं।

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तिथि श्राद्ध

क्या द्वितीया स्वाभाविक मृत्यु वालों के लिए है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध मुख्यतः स्वाभाविक मृत्यु वाले पितरों के लिए है। यदि स्वाभाविक मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो श्राद्ध भी द्वितीया को होगा। परंतु अकाल मृत्यु शस्त्र-विष-दुर्घटना से द्वितीया को हुई हो, तो श्राद्ध चतुर्दशी को होगा। सधवा स्त्री का नवमी को, संन्यासी का द्वादशी को, और तिथि अज्ञात हो तो सर्वपितृ अमावस्या को।

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तिथि श्राद्ध

द्वितीया तिथि को मरे व्यक्ति का श्राद्ध कब होता है?

द्वितीया तिथि को स्वाभाविक रूप से मरे व्यक्ति का श्राद्ध भी द्वितीया तिथि को ही होता है। शुक्ल या कृष्ण दोनों पक्षों में मृत्यु पर समान नियम है। मृत्यु दिन में हुई हो या रात में, मृत्यु के समय जो तिथि थी, वही श्राद्ध तिथि मानी जाती है। परंतु अकाल मृत्यु पर चतुर्दशी, सधवा पर नवमी, और संन्यासी पर द्वादशी को श्राद्ध होगा।

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श्राद्ध विधि

द्वितीया श्राद्ध कितने बजे करें?

द्वितीया श्राद्ध दिन के अपराह्न काल में करना चाहिए। सबसे श्रेष्ठ समय है कुतप मुहूर्त 11:36 AM से 12:24 PM तक। फिर रौहिण मुहूर्त 12:24 PM से 01:12 PM तक, और अपराह्न काल 01:12 PM से 03:39 PM तक। ये समय स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार परिवर्तित हो सकते हैं। प्रातःकाल और रात्रिकाल में श्राद्ध सर्वथा वर्जित है।

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श्राद्ध विधि

दूज श्राद्ध किस दिशा में करें?

दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके करना चाहिए। साथ ही कर्ता का जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होना चाहिए। आसन रेशम, कम्बल, काठ यानी लकड़ी या कुशा का होना चाहिए। लोहे का आसन सर्वथा वर्जित है। दक्षिण दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, इसलिए नैऋत्य पितृ-कर्म के लिए शास्त्र-सम्मत है।

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तिथि श्राद्ध

द्वितीया श्राद्ध 2026 में कब है?

द्वितीया श्राद्ध 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को सम्पन्न होगा। यह पितृ पक्ष यानी महालय का दूसरा दिन है, प्रतिपदा के बाद। सटीक दिनांक स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित होगा। श्राद्ध कुतप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त, या अपराह्न काल में किया जाना चाहिए। तिथि वृद्धि होने पर अगले दिन और क्षय होने पर अपराह्न स्पर्श वाले दिन।

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पितृ पक्ष

आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया क्यों खास है?

आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया खास है क्योंकि यह पितृ पक्ष यानी महालय का दूसरा दिन है। इस दिन पार्वण श्राद्ध से तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है, और विश्वेदेव स्थापित होते हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार इस दिन श्राद्ध करने से शिव प्रसन्न होते हैं और कैलास धाम मिलता है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार सुयोग्य दामाद और पशु-धन की प्राप्ति होती है।

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तिथि श्राद्ध

कृष्ण पक्ष की द्वितीया का श्राद्ध कब होता है?

कृष्ण पक्ष की द्वितीया का श्राद्ध मुख्यतः पितृ पक्ष यानी आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया को सम्पन्न होता है। यह दिन प्रतिपदा के बाद आता है। पितृ पक्ष की कृष्ण द्वितीया पर पार्वण श्राद्ध होता है, जिसमें तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मरे पितर का वार्षिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध भी उसी कृष्ण द्वितीया को होता है।

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तिथि श्राद्ध

क्या द्वितीया श्राद्ध शुक्ल पक्ष में भी होता है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध शुक्ल पक्ष में भी होता है। विष्णु पुराण के अनुसार जिन पितरों की मृत्यु किसी भी मास के शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो, उनका वार्षिक क्षयाह श्राद्ध उसी द्वितीया तिथि को होता है। पितृ पक्ष का पार्वण श्राद्ध सबके लिए आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया को होता है।

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तिथि शास्त्र

द्वितीया चन्द्रमा की कौन सी कला है?

द्वितीया चन्द्रमा की दूसरी कला है। वैदिक काल-गणना के अनुसार एक चान्द्र-मास में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें द्वितीया चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। शुक्ल पक्ष में यह बढ़ते क्रम में दूसरी कला होती है, और कृष्ण पक्ष में घटते क्रम में। यह तिथि यमराज से सम्बन्धित मानी गई है।

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तिथि शास्त्र

द्वितीया तिथि क्या होती है?

द्वितीया तिथि चान्द्र-मास की दूसरी तिथि है, जो चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। प्रत्येक पक्ष यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें द्वितीया दूसरी तिथि है। इस तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है, और पितृ-कर्मों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है।

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तिथि श्राद्ध

दूज का श्राद्ध किसे कहते हैं?

दूज का श्राद्ध द्वितीया तिथि के श्राद्ध का लोक-प्रचलित नाम है। दूज शब्द द्वितीया का सरल हिन्दी रूप है। यह विशेष रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, और पितृ पक्ष की दूज पर पार्वण श्राद्ध से सम्पूर्ण कुटुम्ब का श्राद्ध भी सम्पन्न होता है।

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तिथि श्राद्ध

द्वितीया श्राद्ध क्या है?

द्वितीया श्राद्ध वह श्राद्ध कर्म है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर पितृ पक्ष यानी आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है। इसे सामान्य भाषा में दूज का श्राद्ध भी कहते हैं। यह उन पितरों के लिए होता है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो।

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व्रत एवं त्योहार

भाई दूज क्यों मनाते हैं?

भाई दूज इसलिए मनाते हैं क्योंकि इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर भोजन के लिए गए थे। यमुना के स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई इस दिन बहन के हाथों तिलक करवाएगा, उसे यमलोक का भय नहीं होगा।

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पर्व

भैया दूज पर बहन तिलक कैसे लगाए

भैया दूज तिलक: बहन स्नान → चौकी पर लाल कपड़ा → भाई बिठाएँ → अनामिका से रोली तिलक (भ्रूमध्य) + अक्षत → आरती → मिठाई → दक्षिणा। कथा: यमुना ने यमराज को तिलक → अकाल मृत्यु भय नाश।

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त्योहार पूजा

भैया दूज पर यमराज की पूजा क्यों करते हैं?

भैया दूज यमराज: यम-यमुना कथा (बहन ने भोजन कराया→यम ने वर='अकाल मृत्यु नहीं'), यम=मृत्यु देवता (भाई रक्षा), यमुना स्नान=यम भय मुक्ति। बहन→तिलक→भोजन→दक्षिणा। रक्षाबंधन पूरक।

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पर्व

भैया दूज पर पूजा कैसे करें

भैया दूज: कार्तिक शुक्ल द्वितीया। बहन भाई को तिलक (रोली-चावल) → आरती → मिठाई/फल → भोजन खिलाए। भाई उपहार दे। कथा: यमुना ने यमराज का तिलक किया — वरदान: तिलक करवाने वाले को यमभय नहीं। भाई-बहन स्नेह बन्धन।

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आज का पंचांग
आज की तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त

पंचांग सहित दैनिक मुहूर्त, राहु काल और चौघड़िया।

पर्व-पञ्चांग
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होली, दिवाली, नवरात्रि, एकादशी — पर्व-केन्द्रित प्रश्नोत्तर।