विस्तृत उत्तर
भगवान ने मनु-शतरूपा की कोमल, विनययुक्त और प्रेमरसमें पगी हुई वचन-रचना सुनकर कहा —
चौपाई — 'सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना। जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥'
अर्थ — कृपाके समुद्र भगवान् कोमल वचन बोले — तुम्हारे मनमें जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुमको दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना।
विशेष रूप से भगवान ने कहा:
- 1माता का अलौकिक ज्ञान कभी नष्ट नहीं होगा
- 2भगवान स्वयं उनके पुत्ररूप में जन्म लेंगे
इस प्रकार भगवान ने स्वयं 'तुम सम पुत्र' बनने का वरदान दिया — अगले जन्म में मनु-शतरूपा राजा दशरथ और माता कौशल्या के रूप में जन्मे और भगवान श्रीराम उनके ज्येष्ठ पुत्र बने।





