विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में 'दिव्य दृष्टि' उस विशेष आत्मिक क्षमता को कहते हैं जिसमें साधारण भौतिक आँखों से परे — सूक्ष्म, आध्यात्मिक और दैवीय सत्य को देखने की शक्ति प्राप्त होती है। यह केवल मृत्यु के समय नहीं, बल्कि उच्च कोटि के साधकों को जीवनकाल में भी प्राप्त हो सकती है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विश्वरूप दिखाने से पहले 'दिव्य चक्षु' दिए थे — क्योंकि सामान्य आँखों से वह दिव्यरूप देखा नहीं जा सकता था। यही दिव्य दृष्टि है।
मृत्यु के संदर्भ में 'दिव्य दृष्टि' वह अवस्था है जो तब मिलती है जब इंद्रियों का भौतिक आवरण शिथिल होने लगता है और जीवात्मा स्वतंत्र होने लगती है। इस अवस्था में व्यक्ति को जीवन की समग्र सच्चाई, कर्मों का प्रभाव, पूर्वजन्मों के संस्कार और आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध होने लगता है।
गरुड़ पुराण में यह भी कहा गया है कि इस दिव्य दृष्टि में व्यक्ति अपने शरीर को बाहर से देख सकता है — आत्मा शरीर से अलग होकर स्वयं को देखती है। यह एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव है जो मृत्यु को महज एक भौतिक घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा सिद्ध करता है।





