विस्तृत उत्तर
ॐ' (प्रणव) को संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रथम और मूल ध्वनि (अनाहत नाद) माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट नियम है कि किसी भी वैदिक मंत्र की शुरुआत बिना 'ॐ' के नहीं की जा सकती। श्रुति वाक्यों के अनुसार, बिना ॐ के जपा गया मंत्र उस शरीर के समान है जिसका सिर न हो; वह निष्फल हो जाता है।
गायत्री मंत्र (भूर्भुवः स्वः...) त्रिगुणात्मक (सृष्टि, पालन, संहार) और सगुण ब्रह्म की उपासना है, जबकि 'ॐ' निर्गुण और निराकार परब्रह्म का प्रतीक है। गायत्री मंत्र से पहले ॐ का उच्चारण करने से साधक की चेतना पहले असीम और निराकार परब्रह्म से जुड़ती है, और फिर गायत्री के माध्यम से वह ऊर्जा विशिष्ट दिशा में (बुद्धि के प्रकाश के लिए) प्रवाहित होती है। ॐ मंत्र की ऊर्जा को 'लॉक' करने और उसे सीधे ब्रह्मांडीय स्रोत से जोड़ने का कार्य करता है।





