विस्तृत उत्तर
कपटमुनि ने प्रतापभानु का विश्वास जीतने के बाद उसे लालच दिया कि तप से कुछ भी दुर्लभ नहीं। तप के बल से ब्रह्मा सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन करते हैं, शम्भु संहार करते हैं।
चौपाई — 'तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता। तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥'
इसका अर्थ — तपके बलसे ही ब्रह्मा संसारको रचते हैं और तपके बलसे ही विष्णु सारे जगतुका पालन करते हैं। तपके बलसे ही शम्भु संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वीका भार धारण करते हैं।
कपटमुनि ने कहा — 'जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही' — जगतमें मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है। मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा। उसने प्रतापभानु को अमरत्व और अजेयता का लालच दिया ताकि राजा उसके जाल में फँसे।



