विस्तृत उत्तर
हाँ, गरुड़ पुराण में स्पष्ट वर्णन है कि जब मृत्यु का समय निकट आता है, तो व्यक्ति के सामने उसके जीवन के सभी अच्छे और बुरे कर्म एक-एक करके प्रकट होने लगते हैं। यह स्मृति किसी प्रयास से नहीं होती — यह स्वाभाविक रूप से होती है, जैसे जीवन की पूरी पुस्तक अचानक खुल जाए।
गरुड़ पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति अपने जीवन में पुण्यकर्मी रहा है, उसे इस स्मृति से सुकून और शांति का अनुभव होता है। उसे अपने अच्छे कर्मों को देखकर संतोष मिलता है। परंतु जो व्यक्ति पापकर्मों में लिप्त रहा है, उसे इस अवस्था में गहरा पछतावा और भय होता है — जो कर्म उसने किए, वे सब उसकी आँखों के सामने घूमते हैं और वह कुछ भी बदल नहीं सकता।
यह कर्म-स्मृति एक प्रकार का प्राकृतिक न्याय है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को जीवन में ऐसे कार्य करने चाहिए जिन्हें वह मृत्यु के समय याद करके शांत चित्त से जा सके। भगवद्गीता में भी कहा गया है कि मृत्यु के समय जो विचार प्रबल होता है, वही अगले जन्म की दिशा निर्धारित करता है।





