विस्तृत उत्तर
लक्ष्मणजी ने क्रोधित होकर कहा कि यदि प्रभु (रामजी) की आज्ञा मिले तो वे ब्रह्माण्ड गेंद की तरह उठा सकते हैं, मेरु पर्वत मूली की तरह तोड़ सकते हैं।
दोहा — 'तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ। जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ॥'
अर्थ — हे नाथ! आपके प्रतापके बलसे धनुषको कुकुरमुत्ते (बरसाती छत्ते) की तरह तोड़ दूँ। यदि ऐसा न करूँ तो प्रभुके चरणोंकी शपथ है, फिर मैं धनुष और तरकसको कभी हाथमें भी न लूँगा।
लक्ष्मणजी के क्रोधभरे वचन बोलते ही पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओंके हाथी काँप गये। सभी लोग और राजा डर गये। सीताजी के हृदय में हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गये।





