विस्तृत उत्तर
मनु-शतरूपा ने भगवान से 'तुम सम पुत्र' अर्थात् 'आपके समान पुत्र' का वरदान माँगा।
जब भगवान प्रकट हुए तो शतरूपाजी ने हाथ जोड़कर कहा — भगवान ने पूछा 'तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो।' शतरूपाजी ने कहा —
दोहा — 'सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु। सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥'
अर्थ — हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणोंमें प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन-सहन कृपा करके हमें दीजिये (जो आपके निज भक्तों को मिलता है)।
फिर मनुजी ने कहा — 'सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ। मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥'
अर्थ — मुझे पुत्ररूपसे आपके चरणोंमें प्रीति हो। मुझे बड़ा मूर्ख कहे कोई (कि भगवान से पुत्र माँगता है)। जैसे मणि बिना साँप और जल बिना मछली, वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन है।
भगवान ने कहा — 'जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं' — तुम्हारे मनमें जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुमको दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना।





