विस्तृत उत्तर
सनातन शास्त्रों के अनुसार जीवात्मा स्वभाव से सूक्ष्म और अदृश्य है — वह साधारण नेत्रों से दिखाई नहीं देती। गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि मृत्यु के समय स्थूल नेत्रों से जीवात्मा का निर्गमन नहीं दिखता, परंतु उस समय की कुछ शारीरिक घटनाएँ — जैसे आँखें उलटना, मुख खुला रहना, या शरीर का एकाएक शिथिल हो जाना — प्राण-निर्गमन के बाह्य संकेत माने जाते हैं।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि जो साधक अत्यंत उच्च कोटि के होते हैं, उनकी मृत्यु के समय दिव्य विमान और देवदूत आते हैं जो आत्मा को ले जाते हैं। यह दृश्य सामान्य लोगों को नहीं, बल्कि उस समय वहाँ उपस्थित किसी दिव्यदृष्टि संपन्न व्यक्ति को ही दिख सकता है।
योगशास्त्र के अनुसार कुछ उच्च साधक अपनी समाधि अवस्था में सूक्ष्म शरीर को देखने में सक्षम होते हैं। परंतु सामान्य मनुष्य के लिए जीवात्मा का प्रस्थान अनुभव से परे रहता है।
सारांशतः, जीवात्मा स्वभावतः अदृश्य है। मृत्यु के समय उसका प्रत्यक्ष दर्शन सामान्यतः संभव नहीं होता — केवल उसके परिणाम (शरीर का निश्चेष्ट होना) ही दिखते हैं।





