विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय परिवार के प्रभाव का मार्मिक वर्णन मिलता है। जो व्यक्ति जीवन भर परिवार से अत्यधिक मोह रखता है, अपनों के प्रेम में गहरा आसक्त रहता है — उसे मृत्यु के समय सबसे अधिक कष्ट होता है। प्राण छोड़ने में वह कठिनाई अनुभव करता है और उसकी आँखें खुली रह जाती हैं क्योंकि आत्मा आँखों के माध्यम से निकलती है — वह अपने परिजनों को देखते हुए जाती है।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने घर में 13 दिनों तक रहती है। वह अपने परिजनों को देखती है, पुकारती है, परंतु परिवार उसे नहीं सुन सकता। यह दृश्य जीवात्मा के लिए अत्यंत कष्टकारी होता है।
परिवार की सकारात्मक भूमिका भी है — यदि परिजन शांत भाव से ईश्वर-स्मरण और पाठ करते हैं तो मरणासन्न व्यक्ति की चेतना शांत होती है। रोना-पीटना, विलाप करना — इससे मरणासन्न व्यक्ति का मन अशांत होता है जो उसके अंतिम क्षणों को कठिन बना देता है।
इसीलिए सनातन परंपरा में मृत्यु के समय और बाद में भजन-कीर्तन, गीता-पाठ और शांत वातावरण का विधान है — ताकि जीवात्मा को सद्गति मिले।





