विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में इस प्रश्न का बहुत स्पष्ट उत्तर दिया गया है। जब मृत्यु का समय निकट आता है, तो सबसे पहले व्यक्ति की वाक्-शक्ति — बोलने की क्षमता — समाप्त हो जाती है। इसका कारण यह है कि जीवात्मा जब शरीर से अपना संबंध तोड़ने लगती है, तो वाणी (जिह्वा और कंठ से संबंधित इंद्रिय) सर्वप्रथम शिथिल होती है।
गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं — 'वह व्यक्ति बोलना चाहता है, परंतु बोल नहीं पाता। उसकी इंद्रियाँ एक-एक करके निष्क्रिय होती जाती हैं।' वाणी प्राणशक्ति का बाह्यतम प्रकाशन है — जब प्राण अंदर सिमटने लगते हैं, तो वाणी सबसे पहले जाती है।
यह आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसीलिए सनातन परंपरा में मरणासन्न व्यक्ति के पास बैठकर ईश्वर का नाम, गीता के श्लोक या रामायण का पाठ किया जाता है — क्योंकि सुनने की इंद्रिय (श्रवण) वाणी की तुलना में अधिक देर तक सक्रिय रहती है। मरणासन्न व्यक्ति सुन सकता है भले ही बोल न सके।
इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि अंतिम समय में कान में ईश्वर-नाम का उच्चारण करना एक अनुपम उपहार है।





