विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय व्यक्ति की मानसिक स्थिति का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि यह पूर्णतः उसके जीवनकाल के कर्मों और चित्त की अवस्था पर निर्भर करती है।
जो व्यक्ति जीवन भर धर्माचरण, भक्ति और सत्कर्मों में रहा हो, उसका मन मृत्यु के समय शांत, स्थिर और ईश्वरोन्मुखी होता है। उसे मृत्यु एक उत्सव की तरह अनुभव होती है। उसे दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं और भय का लेश भी नहीं होता।
दूसरी ओर, जो व्यक्ति जीवन भर इंद्रियों के वश में रहा हो, मोह-माया में डूबा रहा हो, पाप किए हों — उसका मन मृत्यु के समय अत्यंत व्याकुल, भयभीत और अशांत होता है। यमदूतों को देखकर वह और भी घबराता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का यह वचन अत्यंत महत्वपूर्ण है — 'अंत काले च माम् एव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्' — जो मृत्यु के समय मुझे स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि मृत्यु के समय मन की अवस्था ही अगले जन्म का निर्धारण करती है। इसीलिए जीवन भर ईश्वर-स्मरण का अभ्यास करना चाहिए।





