विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जब मृत्यु का समय निकट आता है, तो व्यक्ति को अपने जीवन के अच्छे और बुरे कर्म स्पष्ट रूप से याद आने लगते हैं। यह स्मृति अनायास होती है — उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, जीवन के दृश्य स्वतः उसके सामने प्रकट होने लगते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार जो व्यक्ति जीवन भर मोह-माया में रहा, उसे मृत्यु के समय अपने परिवार, संपत्ति और अधूरी इच्छाएँ याद आती हैं। यही मोह उसे सद्गति प्राप्त करने में बाधा डालता है।
जो व्यक्ति जीवन भर ईश्वर-स्मरण करता रहा, उसे अंत समय में भगवान का स्मरण होता है। भगवद्गीता में कहा गया है — 'अंतकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्' — अर्थात् जो मृत्यु के समय मुझे स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है।
राजा भरत का प्रसंग इसका प्रमाण है — मृत्यु के समय उनके मन में एक हिरण का मोह था, इसलिए अगले जन्म में वे हिरण बने। इसीलिए शास्त्रों में जीवन भर ईश्वर-स्मरण का अभ्यास करने पर जोर दिया गया है, ताकि अंत समय में सहज रूप से वही स्मरण हो।





