विस्तृत उत्तर
नारदजी को स्वयंवर में वानर (बन्दर) का मुख मिला। भगवान विष्णु ने 'हरि रूप' देने के नाम पर उन्हें बन्दर का चेहरा दे दिया।
वहाँ शिवजी के दो गण ब्राह्मण वेष में मौज-मस्ती कर रहे थे। उन्होंने नारदजी को मुस्कुराकर कहा — 'जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये!'
चौपाई — 'अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी। बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥'
अर्थ — ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनिने जलमें झाँककर अपना मुँह देखा। अपना वेष (बन्दर का मुख) देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजीके उन गणोंको अत्यन्त कठोर शाप दिया।
नारदजी ने शिवगणों को शाप दिया — 'होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥' — तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ।





