विस्तृत उत्तर
परशुरामजी ने श्रीरामजी को परब्रह्म पहचानकर अत्यन्त प्रेम और पुलक से भरी स्तुति की।
दोहा — 'जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात॥'
अर्थ — तब उन्होंने श्रीरामजीका प्रभाव जाना, उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले — प्रेम उनके हृदयमें समाता न था।
स्तुति — 'जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू। जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी' — हे रघुकुलरूपी कमलवनके सूर्य! राक्षसकुलरूपी घने जंगलको जलानेवाले अग्नि! देवता, ब्राह्मण और गौका हित करनेवाले! मद, मोह, क्रोध और भ्रम को हरनेवाले! आपकी जय हो!
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