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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 2 मिनट पठन

पार्वतीजी ने सप्तर्षियों की शिवनिन्दा सुनकर क्या उत्तर

पार्वतीजी ने कहा — 'जन्म कोटि लगि रगर हमारी।

संक्षिप्त उत्तर

पार्वतीजी ने कहा — 'जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी' — करोड़ जन्मों तक या तो शिवजी को वरूँगी या कुमारी रहूँगी। स्वयं शिवजी मना करें तब भी नारदजी का उपदेश नहीं छोडूँगी। ऋषि प्रसन्न हुए — 'जय जगदम्बिके भवानी!'

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विस्तृत उत्तर

पार्वतीजी ने सप्तर्षियों की शिवनिन्दा सुनकर अत्यन्त दृढ़ता से उत्तर दिया और अपने संकल्प पर अडिग रहीं।

पार्वतीजी ने कहा — 'जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा। अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करैं बिचारा॥'

अर्थ — हे मुनीश्वरो! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परन्तु अब तो मैंने अपना जन्म शिवजीके लिये हार चुकी। फिर गुण-दोषोंका विचार कौन करे?

फिर दृढ़ता से कहा — 'जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी। तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥'

अर्थ — मेरा तो करोड़ जन्मोंतक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजीको वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजीके उपदेशको न छोडूँगी।

यह सुनकर ऋषिलोग प्रसन्न हो गये — 'सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह' — और बोले 'जय जगदम्बिके भवानी!' — तुम माया हो और शिवजी भगवान हैं, तुम दोनों समस्त जगतके माता-पिता हो।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

पार्वतीजी ने सप्तर्षियों की शिवनिन्दा सुनकर क्या उत्तर दिया को संदर्भ सहित समझें

पार्वतीजी ने सप्तर्षियों की शिवनिन्दा सुनकर क्या उत्तर दिया का सबसे सीधा सार यह है: पार्वतीजी ने कहा — 'जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी' — करोड़ जन्मों तक या तो शिवजी को वरूँगी या कुमारी रहूँगी। स्वयं...

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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