विस्तृत उत्तर
पार्वतीजी ने सप्तर्षियों की शिवनिन्दा सुनकर अत्यन्त दृढ़ता से उत्तर दिया और अपने संकल्प पर अडिग रहीं।
पार्वतीजी ने कहा — 'जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा। अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करैं बिचारा॥'
अर्थ — हे मुनीश्वरो! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परन्तु अब तो मैंने अपना जन्म शिवजीके लिये हार चुकी। फिर गुण-दोषोंका विचार कौन करे?
फिर दृढ़ता से कहा — 'जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी। तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥'
अर्थ — मेरा तो करोड़ जन्मोंतक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजीको वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजीके उपदेशको न छोडूँगी।
यह सुनकर ऋषिलोग प्रसन्न हो गये — 'सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह' — और बोले 'जय जगदम्बिके भवानी!' — तुम माया हो और शिवजी भगवान हैं, तुम दोनों समस्त जगतके माता-पिता हो।

