विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में पशु-पक्षी 'भोग योनि' में माने जाते हैं। इसका अर्थ है कि वे अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल भोगने के लिए उस योनि में जन्मे हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी जीवात्मा अपने कर्मों और स्वभाव के अनुसार अगली योनि में जन्म लेती है।
कठोपनिषद में यमराज कहते हैं कि जिनके पाप अधिक और पुण्य कम होते हैं, वे पशु-पक्षी योनि में जन्म लेते हैं। और जिनके पाप अत्यधिक हों, वे वृक्ष-लता जैसी स्थावर योनियों में जन्म लेते हैं।
पुराणों के अनुसार पशु-पक्षी योनि में जीवात्मा क्रमशः उच्च योनियों की ओर बढ़ती है। यही 'उर्ध्व गति' का सिद्धांत है — निम्न योनियों से उच्च योनियों की ओर चेतना का विकास। यह यात्रा तब तक जारी रहती है जब तक जीवात्मा पुनः मनुष्य योनि में न आ जाए।
इसके अपवाद भी हैं — गरुड़ और विष्णु पुराण में गजेंद्र-ग्राह की कथा है जहाँ पशु योनि में रहते हुए भी भगवान की कृपा से मोक्ष मिला। किंतु यह सामान्य नियम नहीं, विशेष दिव्य कृपा का उदाहरण है।





