विस्तृत उत्तर
पिण्डदान श्राद्ध का हृदय है। शास्त्रीय आधार के अनुसार पिण्डदान श्राद्ध का हृदय है। पके हुए चावल, गाय का दूध, घी, शहद, जौ और काले तिल को मिलाकर गोलाकार पिण्ड निर्मित किए जाते हैं। वेदी पर कुशा बिछाकर उन पर तीन पीढ़ियों के प्रतीक स्वरूप तीन पिण्ड स्थापित किए जाते हैं।
पिण्डदान शब्द का अर्थ देखें तो पिण्ड का अर्थ है गोलाकार आकृति, और दान का अर्थ है अर्पण। अर्थात् गोलाकार पिण्डों का अर्पण ही पिण्डदान कहलाता है। पिण्डों के निर्माण में छह प्रमुख सामग्रियाँ लगती हैं। पहली सामग्री है पके हुए चावल, दूसरी गाय का दूध, तीसरी घी, चौथी शहद, पाँचवीं जौ, और छठी काले तिल। इन सभी को एक साथ मिलाकर गोलाकार पिण्ड बनाए जाते हैं।
पिण्डों की संख्या और स्थापना का विशेष विधान है। तीन पिण्ड बनाए जाते हैं, क्योंकि ये तीन पीढ़ियों के प्रतीक होते हैं। ये तीन पीढ़ियाँ हैं पिता, पितामह अर्थात् दादा, और प्रपितामह अर्थात् परदादा। याज्ञवल्क्य स्मृति का स्पष्ट कथन है कि ये तीन पूर्वज क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य देवताओं के समान माने जाते हैं।
पिण्डों की स्थापना की विधि में वेदी पर कुशा बिछाई जाती है, और उन कुशा पर पिण्ड स्थापित किए जाते हैं। कुशा का प्रयोग इसलिए होता है क्योंकि कुशा साक्षात् भगवान वराह के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई है, और यह अत्यंत पवित्र मानी जाती है।
पिण्डदान का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि यह श्राद्ध का हृदय है, अर्थात् श्राद्ध का सबसे केंद्रीय और प्रधान अंग है। बिना पिण्डदान के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। पिण्डदान का उद्देश्य पितरों को अन्न के माध्यम से तृप्ति प्रदान करना और तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को सम्मान देना है।
पिण्डदान की उत्पत्ति की कथा भी विशेष है। महाभारत के शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताओं में यह प्रसंग आता है कि संपूर्ण जगत में पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी। जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष नामक महादैत्य का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके दाढ़ से पृथ्वी का कुछ मृदा-अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा। उसी समय पितृ देवता वहाँ उपस्थित हुए और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की। भगवान वराह ने उस मृदा अंश से तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया। भगवान ने यह दिव्य उद्घोष किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं।
पितरों को क्या प्रिय है तो विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल अत्यंत प्रिय हैं। यही कारण है कि पिण्डों में इन सामग्रियों का प्रयोग होता है। पिण्डदान का सर्वश्रेष्ठ समय रौहिण मुहूर्त 12:44 से 01:34 तक है, जो तर्पण और पिण्डदान की प्रक्रिया के लिए उत्तम है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। निष्कर्षतः पिण्डदान श्राद्ध का हृदय है, जिसमें पके हुए चावल, गाय का दूध, घी, शहद, जौ और काले तिल को मिलाकर गोलाकार तीन पिण्ड बनाए जाते हैं, जो पिता, पितामह और प्रपितामह तीन पीढ़ियों के प्रतीक होते हैं, और इन्हें वेदी पर कुशा बिछाकर स्थापित किया जाता है।
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