विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में तीन पिंड रखने का गहरा अर्थ है — ये तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
तीन पिंड = तीन पीढ़ी
- 1प्रथम पिंड = पिता (वसु रूप)
- 2द्वितीय पिंड = दादा/पितामह (रुद्र रूप)
- 3तृतीय पिंड = परदादा/प्रपितामह (आदित्य रूप)
Pooja Path: *'प्रथम पिंड में विधाता, द्वितीय में गरुड़ध्वज (विष्णु), तृतीय में यमदूत — ऐसा प्रयोग कहा गया। तीसरा पिंडदान देते ही मृत व्यक्ति शरीर के दोषों से मुक्त हो जाता है।'*
सपिंडीकरण: तीन पिंडों को आपस में मिलाना = सपिंडीकरण — मृतक की आत्मा को पितरों में विलीन करना। इसके बाद मृतक 'प्रेत' नहीं रहता, 'पितर' बन जाता है।
12 पिंड विधि: विस्तृत विधि में 12 पिंड भी बनाए जाते हैं — देवता, ऋषि, दिव्य मानव, यम आदि सभी के लिए।





