विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में सपिंडीकरण के परिणामों का स्पष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन है।
प्रेत से पितर — सपिंडीकरण का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि मृत आत्मा 'प्रेत' की अवस्था से निकलकर 'पितर' बन जाती है। यह एक महत्वपूर्ण आत्मिक उन्नति है।
प्रेतत्व से मुक्ति — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जब शास्त्रोक्त विधि से उसका प्रेत-संस्कार, दशगात्र वधान, षोडश श्राद्ध, सपिण्डन विधान किया जाता है, तब वह प्रेत-शरीर से मुक्त हो जाता है।'
पितर-श्रेणी में प्रवेश — सपिंडन के बाद मृत व्यक्ति पारिवारिक पितरों की श्रेणी में शामिल हो जाता है और प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष के श्राद्ध में उसका स्मरण होता है।
आगे की गति — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'श्राद्ध से तृप्त होकर सभी पितर पुत्र को वांछित फल देते हैं और धर्ममार्ग से धर्मराज के प्रासाद में जाकर वे धर्मराज की सभा में आदरपूर्वक विराजमान रहते हैं।'
इस प्रकार सपिंडीकरण प्रेत-मुक्ति की प्रक्रिया का चरम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है।





