विस्तृत उत्तर
सतीजी ने श्रीराम की परीक्षा लेने के लिये माता सीताजी का रूप धारण किया।
दोहा — 'पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप। आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥'
इसका अर्थ — सती बार-बार मनमें विचारकर सीताजीका रूप धारण करके उस मार्गकी ओर आगे होकर चलीं, जिससे (सतीजीके विचारानुसार) मनुष्योंके राजा रामचन्द्रजी आ रहे थे।
सतीजी ने सोचा कि यदि ये सचमुच परब्रह्म हैं तो सीता रूप देखकर पहचान लेंगे, और यदि साधारण मनुष्य हैं तो धोखा खा जायेंगे। इस प्रकार सतीजी ने सीताजी का वेष बनाकर श्रीरामजी के सामने जाने का निश्चय किया।





