विस्तृत उत्तर
शिवजी की अखण्ड समाधि के दौरान सतीजी कैलास पर रहने लगीं। उनके मन में बड़ा दुख और सोच था क्योंकि शिवजी ने प्रकट में कुछ नहीं कहा था, पर उनका व्यवहार बदल गया था। सतीजी समझ गयी थीं कि उन्होंने अपराध किया है।
दोहा — 'सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥'
इसका अर्थ — तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था।
सतीजी नित्य सोचती थीं — 'कब जैहउँ दुख सागर पारा। मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥' — कब मैं इस दुख-सागर को पार करूँगी? मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पतिके वचनोंको झूठ जाना — उसका फल विधाताने मुझको दिया।





