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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 2 मिनट पठन

शिवजी ने नारदजी को अभिमान करने से क्यों मना किया?

शिवजी जानते थे कि काम-विजय भगवान की कृपा से हुई, नारदजी की अपनी शक्ति नहीं।

संक्षिप्त उत्तर

शिवजी जानते थे कि काम-विजय भगवान की कृपा से हुई, नारदजी की अपनी शक्ति नहीं। भगवान की माया प्रचण्ड है — किसी को भी मोहित कर सकती है। अभिमान करने पर माया का शिकार होना निश्चित था, इसलिये शिवजी ने बरज (मना) दिया।

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विस्तृत उत्तर

शिवजी ने नारदजी को अभिमान करने से इसलिये मना किया क्योंकि वे जानते थे कि भगवान की माया अत्यन्त प्रचण्ड है — वह किसी को भी मोहित कर सकती है। काम-विजय नारदजी की अपनी शक्ति नहीं बल्कि भगवान की कृपा थी।

भगवान विष्णु ने भी नारदजी से कहा — 'रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान। तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥'

अर्थ — भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले — हे मुनिराज! आपका स्मरण करनेसे दूसरोंके मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं (फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है?)।

फिर भगवान ने समझाया — 'सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें। ब्रह्मचरज ब्रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥'

अर्थ — हे मुनि! मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्यव्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?

परन्तु भगवान ने यह सब अपनी माया-लीला के तहत कहा — वे जानते थे कि नारदजी का अभिमान तोड़ना आवश्यक है।

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