विस्तृत उत्तर
नारदजी का अभिमान तोड़ने के लिये भगवान विष्णु ने एक अत्यन्त सुन्दर मायावी नगर रचा जिसमें एक राजा रहता था। उस राजा की एक अत्यन्त सुन्दर राजकुमारी थी जो सब गुणोंकी खान भगवान्की माया ही थी। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।
नारदजी कौतुकवश उस नगर में गये। राजा ने राजकुमारी को नारदजी के सामने लाकर उनसे गुण-दोष बताने को कहा।
राजकुमारी का रूप देखकर नारदजी वैराग्य भूल गये और मोहित हो गये — 'देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी। लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥'
अर्थ — उसके रूपको देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देरतक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आपको भी भूल गये और हृदयमें हर्षित हुए, पर प्रकटरूपमें उन लक्षणोंको नहीं कहा।
इस प्रकार भगवान ने माया से एक सुन्दर राजकुमारी, नगर और स्वयंवर रचकर नारदजी को मोहित किया।





