विस्तृत उत्तर
भरतजी राजा दशरथ और रानी कैकेयी के पुत्र थे। चारों भाइयों में भरतजी का जन्म कैकेयी से हुआ। भरतजी श्रीरामजी के अनन्य भक्त और प्रेमी थे।
बालकाण्ड में भरतजी की वन्दना — 'प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना। राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥'
अर्थ — भाइयोंमें सबसे पहले मैं श्रीभरतजीके चरणोंको प्रणाम करता हूँ, जिनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जिनका मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें भौंरेकी तरह लुभाया हुआ है, कभी उनका पास नहीं छोड़ता।





