विस्तृत उत्तर
स्वास्तिक सनातन धर्म का सबसे प्राचीन और शुभ चिन्ह है — यह शब्द 'सु + अस्ति' से बना है जिसका अर्थ है 'सब कुशल हो'। गृह प्रवेश से लेकर पूजन, विवाह, त्योहार और प्रतिदिन की दिनचर्या में इसे बनाना मंगलकारी माना जाता है।
स्वास्तिक बनाने की सही विधि: स्वास्तिक सदैव दक्षिणावर्त (clockwise) बनाना चाहिए — जिसमें चारों भुजाओं की रेखाएं दाहिनी ओर मुड़ी हों। यह शुभ स्वास्तिक का स्वरूप है। वामावर्त (anticlockwise) स्वास्तिक को तंत्र में अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है, सामान्य गृह पूजन में नहीं।
सामग्री: मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाने के लिए लाल सिंदूर, कुमकुम या हल्दी का प्रयोग करना चाहिए। सिंदूर से बना स्वास्तिक शुभता और ऊर्जा का सबसे प्रभावी प्रतीक माना जाता है।
स्थान: मुख्य द्वार के दोनों ओर या मध्य में स्वास्तिक बनाना शुभ है। घर की दिशा के अनुसार रंग का चुनाव भी किया जा सकता है — पूर्वमुखी घर में लाल, उत्तरमुखी में नीला, पश्चिम में पीला या सफेद स्वास्तिक शुभ माना जाता है।
स्वास्तिक को शुभ मुहूर्त में बनाना चाहिए। जब भी स्वास्तिक फीका पड़ जाए या मिट जाए — त्योहारों पर, दीपावली पर, नव वर्ष पर — उसे नया बना देना चाहिए। स्वास्तिक वाले स्थान को सदा स्वच्छ रखें। स्वास्तिक को गंदगी या कूड़ेदान के पास कभी न बनाएं।





