विस्तृत उत्तर
जनकपुर की स्त्रियों ने श्रीराम-लक्ष्मण को देखकर अत्यन्त मुग्ध होकर आपस में अनेक बातें कहीं।
किसी ने कहा — 'देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई' — श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर कोई कहने लगी — यह वर जानकीके योग्य है।
किसी ने कहा — 'जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू' — यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हींसे विवाह कर देगा।
किसी ने कहा — 'कोउ कह जौं ए बर बरैं। तौ सखि कहा बुझाइ' — यदि विधाता भले हैं और सबको उचित फल देते हैं, तो जानकीको यही वर मिलेगा — इसमें सन्देह नहीं।
किसी ने शंकर धनुष की चिन्ता जताई — 'कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा' — शंकरजीका धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीरके बालक हैं।





