विस्तृत उत्तर
जनकपुर में श्रीरामजी को देखकर नगरवासियों ने अनेक प्रकार की बातें कहीं — सब मुग्ध और प्रेममय हो गये।
चौपाई — 'पुर खरभरु सोभा अधिकाई। करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥' — नगर में चहल-पहल मच गयी।
स्त्रियों ने विशेष रूप से कहा — (1) यह वर जानकी के योग्य है, (2) विधाता उचित फल दें तो जानकी को यही वर मिले, (3) शंकर धनुष कठोर है और ये कोमल शरीर — चिन्ता भी, (4) इनके रूप में बड़ा प्रभाव है — देखने में छोटे लगते हैं पर शक्ति अपार है।
किसी ने कहा — 'सबु असमंजस अहइ सयानी' — सब कुछ असमंजस (उलझन) में है, हे सयानी सखी!
लोगों ने यह भी कहा कि 'नाहीं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि' — नहीं तो हमें इनके दर्शन दुर्लभ हैं — यह संयोग तभी होता है जब पूर्वजन्मों के बहुत पुण्य हों।





