विस्तृत उत्तर
प्राचीन भारत में मंत्र-संचालित अस्त्र एक विकसित विद्या थी जिसका वर्णन धनुर्वेद, अग्नि पुराण और महाभारत में मिलता है।
मूल सिद्धांत — दिव्यास्त्रों में मंत्रशक्ति समाहित होती थी। प्रत्येक अस्त्र का एक विशेष देवता था और उस देवता से संबंधित मंत्र था। जब योद्धा उस मंत्र का विधिपूर्वक उच्चारण करता था तो देवता की शक्ति सक्रिय होकर उस अस्त्र में प्रविष्ट हो जाती थी।
प्रक्रिया — पहले योद्धा अपने मन में संकल्प करता था। फिर विशेष मंत्र उच्चारण के साथ बाण को धनुष पर चढ़ाता था। मंत्र के पूर्ण होते ही अस्त्र में दिव्य शक्ति संचारित हो जाती थी। चलाने के साथ-साथ मंत्र का उच्चारण अनिवार्य था। पाशुपतास्त्र जैसे अस्त्र मन, नेत्र और वाणी से भी चलाए जा सकते थे।
गुरु-शिष्य परंपरा — अस्त्र-मंत्र गोपनीय थे और केवल गुरु-शिष्य परंपरा में प्रदान किए जाते थे। बिना मंत्र-ज्ञान के दिव्यास्त्र नहीं चल सकता था। इसीलिए परशुराम का शाप इतना घातक था — कर्ण को सबसे जरूरी समय में मंत्र याद नहीं रहेगा।
वापस लेने की विधि — जो योद्धा अस्त्र का मंत्र जानता था वह उसे वापस भी बुला सकता था। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का वापस-मंत्र भूल गया था इसलिए उसे उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ना पड़ा।





