विस्तृत उत्तर
माता कौशल्या ने भगवान का दिव्य चतुर्भुज रूप देखकर प्रार्थना की — हे तात! यह विष्णु-रूप छोड़कर बालक बन जाओ और प्रिय बाललीला करो।
छन्द — 'माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा॥'
अर्थ — माताकी बुद्धि बदली, वह बोली — हे तात! यह रूप छोड़कर प्रिय बाललीला करो, यह सुख अनुपम है। यह सुनकर सुजान भगवान बालक होकर रोने लगे।
तुलसीदासजी कहते हैं — जो इस चरित्र का गान करते हैं, वे हरिपद पाते हैं और भवकूप (संसार) में नहीं गिरते।





