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जीवन एवं मृत्यु⏱ 2 मिनट पठन

मृत्यु के समय व्यक्ति की चेतना कैसी होती है?

मृत्यु के समय व्यक्ति को दिव्य दृष्टि मिलती है और वह अपना पूरा जीवन देख सकता है।

संक्षिप्त उत्तर

मृत्यु के समय व्यक्ति को दिव्य दृष्टि मिलती है और वह अपना पूरा जीवन देख सकता है। चेतना की अवस्था कर्मों पर निर्भर करती है — पुण्यात्मा को शांति, पापी को भय। अंतिम विचार अगला जन्म तय करता है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय व्यक्ति की चेतना का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब मृत्यु का क्षण आता है, तो व्यक्ति को 'दिव्य दृष्टि' प्राप्त होती है। इस अवस्था में वह अपने पूरे जीवन की घटनाओं को एक क्षण में देख सकता है — जैसे जीवन की पूरी पुस्तक एक साथ खुल जाती हो।

गरुड़ पुराण के अनुसार मरणासन्न व्यक्ति की चेतना उसके जीवनभर के कर्मों और स्वभाव के अनुसार होती है। जो पुण्यात्मा होता है, उसे इस अवस्था में शांति, प्रकाश और दिव्य अनुभूति होती है। जो पापात्मा होता है, उसे यमदूत दिखाई देते हैं, भय और कष्ट का अनुभव होता है।

कठोपनिषद और उपनिषदों में बताया गया है कि मृत्यु के समय मन जिस विचार में स्थिर होता है — वही अगले जन्म की दिशा निर्धारित करता है। इसीलिए सनातन परंपरा में अंतिम समय में 'राम-नाम' या ईश्वर-स्मरण का बहुत महत्व है।

जो जीवन भर साधना और ईश्वर-भक्ति में रहा, उसकी मृत्यु के समय की चेतना स्थिर, शांत और ईश्वर-मुखी होती है। यही कारण है कि शास्त्रों में सदाचारी जीवन जीने और प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करने पर इतना बल दिया गया है।

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