विस्तृत उत्तर
नारदजी को इस बात का अभिमान हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया। जब कामदेव इन्द्र के कहने पर नारदजी की तपस्या भंग करने उनके आश्रम में गया, तो कामदेव की कोई भी कला नारदजी पर नहीं चली — उनकी समाधि अचल रही।
चौपाई — 'काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥'
इसका अर्थ — कामदेवकी कोई भी कला मुनिको नहीं व्यापी (प्रभावित न कर सकी)। अपने ही डरसे पापी कामदेव डर गया।
वास्तव में यह भगवान की माया थी — भगवान ने स्वयं नारदजी की रक्षा की थी, पर नारदजी समझ बैठे कि यह उनकी अपनी तपोबल की शक्ति है। इसी अभिमान में वे पहले शिवजी को और फिर भगवान विष्णु को अपनी काम-विजय का वृत्तान्त सुनाने चले गये।





