विस्तृत उत्तर
परशुरामजी ने श्रीरामजी का प्रभाव जानकर, पुलकित और प्रफुल्लित होकर स्तुति की — 'जय रघुबंस बनज बन भानू' — और फिर अत्यन्त प्रेम से प्रणाम करके तपोवन को चले गये।
दोहा — 'बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥' — बहुत प्रकारसे मुनिको समझा-बुझाकर (ढाढ़स देकर) तब प्रभु अन्तर्धान हो गये। और नारदजी सत्यलोक (ब्रह्मलोक) को श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान करते हुए चले।
परशुरामजी ने अपना वैष्णव धनुष रामजी को देकर, उनकी स्तुति करके प्रसन्नतापूर्वक विदा ली। उनके जाने के बाद सभा में बड़ा आनन्द छा गया।





