विस्तृत उत्तर
पार्वतीजी की तपस्या इतनी भीषण थी कि तीनों लोकों में हलचल मच गयी। उनका शरीर तपसे क्षीण हो गया और देखकर ब्रह्माजी की गम्भीर आकाशवाणी हुई।
चौपाई — 'देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥'
इसका अर्थ — तपसे उमाका शरीर क्षीण देखकर आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई।
ब्रह्मवाणी ने कहा — 'भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥'
अर्थ — हे पर्वतराजकी कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू सारे असह्य क्लेशोंको त्याग दे। अब तुझे त्रिपुरारि (शिवजी) मिलेंगे।
आगे कहा — 'अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥' अर्थ — हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा (कठोर) तप किसीने नहीं किया।
ब्रह्मवाणी ने यह भी कहा कि जब पिता बुलाने आयें तब हठ छोड़कर घर चली जाना, और जब सप्तर्षि मिलें तब इस वाणी को ठीक समझना।





