विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत-अवस्था के उत्पन्न होने के समय और परिस्थितियों का वर्णन है।
मृत्यु के तुरंत बाद — प्रेत अवस्था मृत्यु के तुरंत बाद उत्पन्न होती है। जब जीवात्मा स्थूल शरीर त्याग देती है, तब वह एक संक्रमण-अवस्था में होती है जिसे प्रेत-अवस्था कहते हैं।
तेरह दिनों तक — गरुड़ पुराण के अनुसार सामान्य मृत्यु में भी जीवात्मा मृत्यु के बाद तेरह दिनों तक प्रेत-अवस्था में रहती है। इस अवधि में वह अपने परिजनों के पास रहती है, उनकी क्रियाएँ देखती है और पिंडदान से शक्ति पाती है।
अकाल मृत्यु में — अकाल मृत्यु की स्थिति में यह अवस्था अधिक दीर्घ होती है। शेष प्राकृतिक आयु पूरी होने तक प्रेत योनि में रहना पड़ता है।
संस्कार न मिलने पर — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जिसका पिंडदान नहीं होता, वह कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करता है।'
प्रेत अवस्था समाप्ति — उचित श्राद्ध-पिंडदान और संस्कारों के पूर्ण होने पर प्रेत-अवस्था समाप्त होती है और जीव आगे की यात्रा पर निकल जाता है।





