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विस्तृत उत्तर
ग्यारहवें और बारहवें दिन प्रेत को अन्न, जल और दीपदान दिया जाता है। दसवें दिन पिण्डज शरीर पूर्ण होने के बाद उसमें असीम भूख उत्पन्न होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार इन दो दिनों में परिजनों द्वारा दिया गया अन्न, जल और दीपदान प्रेत पूर्ण रूप से ग्रहण करता है। दीपदान इस तृप्ति-विधान का भाग है और प्रेत के लिए किए जाने वाले एकादशाह तथा द्वादशाह कृत्यों में शामिल है।
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