विस्तृत उत्तर
नैवेद्य वह भोग है जो पूजन के समय भगवान को अर्पित किया जाता है। शास्त्रों में इसके लिए विशेष नियम बताए गए हैं जिनका पालन करने से ही भोग भगवान को स्वीकार्य होता है।
नैवेद्य सात्विक होना चाहिए — इसमें प्याज, लहसुन, मांस, मछली, अंडा या कोई भी तामसिक वस्तु नहीं होनी चाहिए। भोग बनाते समय शुद्धता अनिवार्य है — साफ बर्तन, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर, पवित्र मन से बनाएं। खाना बनाते समय चखना या झूठा करना वर्जित है। नैवेद्य को भगवान की मूर्ति के सामने रखकर उनका ध्यान करते हुए अर्पित करें।
नैवेद्य के साथ जल भी अर्पित करना चाहिए। अलग-अलग देवताओं के लिए अलग-अलग भोग निर्धारित हैं — जैसे गणेश को मोदक, कृष्ण को माखन-मिश्री, विष्णु को तुलसी सहित नैवेद्य, शिव को बेलपत्र-सहित पंचामृत। नैवेद्य अर्पण के बाद उसे आचमन का जल देकर समापन करें और तब उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें। भोग को जमीन पर नहीं रखना चाहिए, बल्कि आसन या पात्र में रखकर अर्पित करें। बासी भोग भगवान को नहीं चढ़ाना चाहिए — नैवेद्य ताजा होना चाहिए।





