विस्तृत उत्तर
पुष्पवाटिका में श्रीरामजी ने सीताजी को तब देखा जब सीताजी सखियों के साथ गिरिजा पूजन के बाद बाग में फूल चुन रही थीं और रामजी लक्ष्मणजी के साथ फूल लेने आये थे।
जब कंगन, किंकिनी और नूपुर की ध्वनि सुनाई दी, तब रामजी ने लक्ष्मणजी से हृदय में विचारकर कहा — मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है।
चौपाई — 'कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि। मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥'
फिर रामजी ने उस ओर देखा — 'अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा' — सीताजीके मुखरूपी चन्द्रमा के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये।
सीताजी की शोभा देखकर रामजी ने बड़ा सुख पाया — 'देखि सीय सोभा सुखु पावा' — मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता मूर्तिमान् कर संसार को दिखा दिया।





