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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई

अर्थ — सब पुत्र मुझे प्राणों समान प्यारे हैं, राम को देना सम्भव नहीं।

संक्षिप्त उत्तर

अर्थ — सब पुत्र मुझे प्राणों समान प्यारे हैं, राम को देना सम्भव नहीं। दशरथ ने कहा — पृथ्वी, गौ, धन, प्राण सब दे दूँगा पर राम नहीं दे सकता। कहाँ भयानक राक्षस, कहाँ मेरा सुकुमार पुत्र।

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विस्तृत उत्तर

इस चौपाई का अर्थ — सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो (गोसाई)! रामको तो किसी प्रकार भी देते नहीं बनता।

आगे दशरथ ने कहा — 'कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा' — कहाँ अत्यन्त भयानक राक्षस और कहाँ मेरा सुकुमार किशोर पुत्र!

दशरथ ने विश्वामित्रजी से कहा — 'मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बसु देउँ आजु सहरोसा। देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं' — आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना माँग लीजिये, आज बड़े हर्षके साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राणसे अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पलमें दे दूँगा — पर राम नहीं दे सकता।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई' — इसका अर्थ को संदर्भ सहित समझें

'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई' — इसका अर्थ का सबसे सीधा सार यह है: अर्थ — सब पुत्र मुझे प्राणों समान प्यारे हैं, राम को देना सम्भव नहीं। दशरथ ने कहा — पृथ्वी, गौ, धन, प्राण सब दे दूँगा पर राम नहीं...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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