विस्तृत उत्तर
वास्तव में नारदजी ने शिवगणों को शाप दिया, शिवगणों ने नारदजी को नहीं।
स्वयंवर में शिवजी के दो गण ब्राह्मण वेष में घूम रहे थे। उन्होंने नारदजी का वानर-मुख देखकर मुस्कुराकर कहा — 'दर्पण में अपना मुँह तो देखिये!' जब नारदजी ने जल में मुँह देखा तो वानर-रूप देखकर अत्यन्त क्रोधित हुए।
नारदजी ने उन दोनों शिवगणों को शाप दिया — 'होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥'
इसका अर्थ — तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस (निशाचर) हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनिकी हँसी करना।
कुछ विद्वानों के अनुसार ये दोनों शिवगण आगे चलकर रावण और कुम्भकर्ण बने, हालाँकि मुख्य परम्परा में रावण-कुम्भकर्ण जय-विजय माने जाते हैं।





