विस्तृत उत्तर
शिवजी ने सतीजी का मानसिक त्याग इसलिये किया क्योंकि सतीजी ने सीताजी का रूप धारण करके श्रीरामजी की परीक्षा ली थी। सीताजी भगवान राम की शक्ति और जगन्माता हैं — शिवजी के लिये वे माता-स्वरूपा हैं। अतः सतीजी ने सीता रूप धारण करके शिवजी की दृष्टि में माता का स्थान ले लिया।
शिवजी ने सोचा — 'जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥' अर्थ — यदि मैं अब सतीसे प्रेम करता हूँ तो भक्तिमार्ग नष्ट हो जायेगा और बड़ा अन्याय होगा।
इसमें दो कारण हैं:
- 1भक्तिमार्ग की रक्षा — सीता भगवान राम की भार्या हैं, उनका रूप धारण करने वाली से पति-भाव रखना भक्ति के विरुद्ध है
- 2शिवजी की प्रतिज्ञा — शिवजी ने रामजी को अपना इष्टदेव माना, सीताजी को जगन्माता माना — अतः सीता-रूपधारिणी से प्रेम करना उनकी भक्ति के विपरीत होता
परन्तु सतीजी परम पवित्र भी थीं, इसलिये शिवजी ने प्रकट में कुछ नहीं कहा, बस मन में संकल्प किया कि इस शरीर में सतीजी से पति-पत्नी की भेंट नहीं होगी।





