विस्तृत उत्तर
शिवजी ने सतीजी के संदेह को जानकर उन्हें समझाया कि ये साक्षात् परब्रह्म श्रीराम हैं और उनकी परीक्षा नहीं लेनी चाहिये।
शिवजी ने कहा — 'जासु कथा कुम्भज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई। सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥'
अर्थ — जिनकी कथा अगस्त्य ऋषिने गाई और जिनकी भक्ति मैंने मुनिको सुनायी, ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीर हैं।
फिर शिवजी ने कहा — 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥' अर्थ — जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे।
इसके बाद शिवजी ने श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे — अर्थात् शिवजी ने मना किया लेकिन सतीजी ने फिर भी परीक्षा लेने का निर्णय कर लिया।
शिवजी ने मना इसलिये किया क्योंकि वे जानते थे कि परब्रह्म की परीक्षा लेना अनुचित है और इसका परिणाम बुरा होगा।





